मानव संसाधन विकास के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, भौगोलिक एवं पर्यावरणीय आयाम

 

के. एस. गुरूपंच1] प्रो. एम. एस. साहू 2

1प्राचार्य, एम. जे. महाविद्यालय, भिलाई (छ..)

2भूगोल विभाग, शासकीय दन्तेश्वरी स्ना. महा. दन्तेवाड़ा (छ..)

 

सारांश

मानव संसाधन हमारे देश भारत के जनसंख्या के बारे में बताता है । इस वजह से हमें मानव के दक्षता, शैक्षिक गुण, उत्पादिता, संगठनात्मक क्षमताओं, और दूरदृष्टिता का पता मिलता है । यह हमारे देश के आर्थिक विकास को बढ़ाता है । मानव संसाधन को मानव पूँजी भी कहा जाता है । मानव संसाधन का महत्व आर्थिक विकास और जनसंख्या वृद्धि दोनों से अंतर्संबंधित है । विकास जितना जनसंख्या को प्रभावित करता है, उतना ही जनसंख्या विकास को प्रभावित करती है। मनुष्य आर्थिक क्रियाओं का अंत और साधन है। इसी कारण मानव संसाधन को एक बड़ी संपत्ति माना जाता है। इस प्रकार आर्थिक विकास में मानव संसाधन की भूमिका का संक्षेप निम्न हैं:-

 

1.   संसाधनों के कुशल उपयोग।

2.   आविष्कार और खोज।

3.   राष्ट्रीय रक्षा।

4.   पूंजी निर्माण।

5.   उत्पादन और खपत।

6.   परिवहन और संचार का विकास।

7.   कौशल और बुद्धि की आपूर्ति।

8.   सभ्य समाज का निर्माण।

9.   श्रम शक्ति की आपूर्ति।

10.  कुशल प्रशासन।

 

उद्देश्य:-

मानव संसाधन विकास के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, भौगोलिक एवं पर्यावरणीय आयाम का अध्ययन करना।

 

आंकड़ों के स्त्रोत:-

द्वितीयक स्त्रोतों से आंकड़े प्राप्त किए गए हैं।

 

 

 

 

प्रस्तावना

मानव संसाधन (ह्यूमन रिसोर्सेस) वह अवधारणा है, जो जनसंख्या को अर्थव्यवस्था पर दायित्व से अधिक परिसंपत्ति के रूप में देखती है। शिक्षा प्रशिक्षण और चिकित्सा सेवाओं में निवेश के परिणाम स्वरूप जनसंख्या मानव संसाधन के रूप में बदल जाती है। मानव संसाधन उत्पादन में प्रयुक्त हो सकने वाली पूँजी है। यह मानव पूँजी कौशल और उनमें निहित उत्पादन के ज्ञान का भंडार है। यह प्रतिभाशाली और काम पर लगे हुए लोगों और संगठनात्मक सफलता के बीच की कड़ी को पहचानने का सूत्र है। यह उद्योग/संगठनात्मक मनोविज्ञान और सिद्धांत प्रणाली संबंधित अवधारणाओं से संबद्ध है।

 

मानव संसाधन का मूल अर्थ राजनीतिक अर्थव्यवस्था और अर्थशास्त्र से लिया गया है, जहां पर इसे पारंपरिक रूप से उत्पादन के चार कारकों में से एक श्रमिक कहा जाता था, यद्धपि यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय स्तर पर नए और योजनाबद्ध तरीकों में अनुसन्धान के चलते बदल रहा है।1, पहला तरीका अधिकतर ‘मानव संसाधन विकास’ शब्द के रूप में प्रयुक्त होता है और यह सिर्फ संगठनों से शुरू होकर राष्ट्रीय स्तर तक हो सकता है। पारम्परिक रूप से यह कारपोरेशन व व्यापार के क्षेत्र में व्यक्ति विशेष (जो उस फर्म या एजेन्सी में कार्य करता है) के लिए तथा कंपनी के उस हिस्से को जो नियुक्ति करने, निकालने, प्रशिक्षण देने तथा दूसरे व्यक्तिगत मुद्दों से सम्बंधित है, व जिसे साधारणतयाः ‘‘मानव संसाधन प्रबंधन’’ के नाम से जाना जाता है, के लिए होता प्रयुक्त होता है।

 

मानव संसाधन विकास एक संरचना है, जो संगठन के, या राष्ट्र के लक्ष्यों को संतोषजनक ढंग से पूरा करने के साथ व्यक्ति विशेष के विकास की अनुमति देता है। व्यक्ति के विकास से व्यक्ति विशेष तथा संगठन दोनों, या राष्ट्र और उसके नागरिकों को लाभ होगा। कॉर्पोरेट दृष्टिकोण के अनुसार, मानव संसाधन ढांचा कर्मचारी को उद्योग की संपत्ति (एस्सेट) की तरह देखता है, जिसकी कीमत विकास के साथ बढ़ती है। ‘‘ इसका प्राथमिक ध्यान विस्तार तथा कर्मचारी का विकास है। यह व्यक्ति की क्षमता और कौशल विकसित करने पर जोर देता है। ’’ (एल्वुड, ओल्टों व ट्रोट 1996)2, इस प्रक्रिया में मानव संसाधन विकास का अर्थ वाँछित परिणाम पाने के उद्देश्य से समूह प्रशिक्षण, व्यवसायिक पाठ्यक्रम या व्यक्ति विशेष के प्रदर्शन के विकास के लिए वरिष्ठ कर्मचारियों द्वारा प्रशिक्षण या सलाह हो सकता है। एक राष्ट्रीय नीति के स्तर पर, राष्ट्रीय उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिए यह एक व्यापक रचनात्मक योगदान हो सकता है।

 

उद्देश्य:-

मानव संसाधन विकास के सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, भौगोलिक एवं पर्यावरणीय आयाम का अध्ययन करना।

 

आंकड़ों के स्त्रोत:-

द्वितीयक स्त्रोतों से आंकड़े प्राप्त किए गए हैं।

 

मानव संसाधन के भौगोलिक आयाम

नवीकरणीय संसाधन अथवा नव्य संसाधन वे संसाधन हैं, जिनके भण्डार में प्राकृतिक/पारिस्थितिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनस्र्थापन (तमचसमदपेीउमदज) होता रहता है। हालाकि मानव द्वारा ऐसे संसाधनों का दोहन (उपयोग) अगर उनके पुनस्र्थापन की दर से अधिक तेजी से हा,े तो फिर ये नवीकरणीय संसाधन नहीं रह जाते और इनका क्षय होने लगता है। ऐसे संसाधनों में ज्यादातर जैव संसाधन आते है, जिनमें जैविक प्रक्रमों द्वारा पुनस्र्थापन होता रहता है। उदाहरण के लिये एक वन क्षेत्र से वनोपजों का मानव उपयोग वन को एक नवीकरणीय संसाधन बनाता है, किन्तु यदि उन वनोपजों का इतनी तेजी से दोहन हो, कि उनके पुनस्र्थापन की दर से अधिक हो जाए, तो वनों का क्षय होने लगेगा। सामान्यतया नवीकरणीय संसाधनों में नवीकरणीय उर्जा संसाधन भी शामिल किये जाते हैं। जैसे- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा इत्यादि। किन्तु सही अर्थों में ये ऊर्जा संसाधन अक्षय ऊर्जा संसाधन हैं न कि नवीकरणीय।

 

विश्व में और भारत में भी जिस तेजी से वनों का दोहन हो रहा है और वनावरण घट रहा है, इन्हें सभी जगह नवीकरणीय की श्रेणी में रखना उचित नहीं प्रतीत होता। वन अंतर्राष्ट्रीय दिवस के मौके पर वन संसाधन पर जारी आंकड़ों में खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ॰ए॰ओ॰) के अनुसार वैश्विक स्तर पर वनों के क्षेत्रफल में निंरतर गिरावट जारी है और विश्व का वनों वाला क्षेत्र वर्ष 1990 से 2010 के बीच प्रतिवर्ष 53 लाख हेक्टेयर की दर से घटा है।3 इसमें यह भी कहा गया ह,ै कि उष्णकटिबंधीय वनों में सर्वाधिक नुकसान दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में हुआ है।

 

मौजूदा आंकलनों के अनुसार भारत में वन और वृक्ष क्षेत्र 78.29 मिलियन हेक्टेयर है, जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का 23.81 प्रतिशत है। 2009 के आंकलनों की तुलना में, व्याख्यात्मक बदलावों को ध्यान में रखने के पश्चात् देश के वन क्षेत्र में 367 वर्ग कि.मी. की कमी दर्ज की गई है।4 भारत में वानिकी एक प्रमुख ग्रामीण आर्थिक क्रिया, जनजातीय लोगों के जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पहलू और एक ज्वलंत पर्यावरणीय और सामाजिक-राजनैतिक मुद्दा होने के साथ ही पर्यावरणीय प्रबंधन और धारणीय विकास हेतु अवसर उपलब्ध करने वाला क्षेत्र भी है।5

 

खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ॰ए॰ओ॰) के अनुसार वर्ष 2001 में भारत में वनों का क्षेत्रफल 64 मिलियन हेक्टेयर था जो कुल क्षेत्रफल का लगभग 19ः था6,और मौजूदा आंकलनों के अनुसार भारत में वन और वृक्ष क्षेत्र 78.29 मिलियन हेक्टेयर है, जो देश के भैगोलिक क्षेत्र का 23.81 प्रतिशत है और 2009 के आंकलनों की तुलना में, व्याख्यात्मक बदलावों को ध्यान में रखने के पश्चात् देश के वन क्षेत्र में 367 वर्ग कि.मी. की कमी दर्ज की गई है।7

 

मानव संसाधन के सामाजिक आयाम

सूचना प्रौद्योगिकी के साथ जो सामाजिक जीवन के तंत्र व प्रणालियाँ हैं, उनका विकास होना चाहिए, न कि स्थानापन्न। मानव के सांस्कृतिक व आर्थिक परिदृश्य को प्रभावित करने वाली यह शक्ति युक्तिमात्र ही रहनी चाहिए। यदि यह स्वयं उद्देश्य बन जाती है, तो वह संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोगों में से एक नहीं है। सूचना का उपयोग सामाजिक विषमता, आर्थिक अवरोधों व सांस्कृतिक जड़ताओं को तोड़ने का साधन होना चाहिए। यदि इसका उपयोग शोषण, विषमताओं आदि से पोषित शक्ति तंत्रों को मजबूत करता है, तो यह प्रौद्योगिकी वर्गीय हितों के पोषण का साधन बन सकती है। इसके अतिरिक्त इसका प्रभाव सामाजिक मूल्यों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

 

सारगर्भित शब्दों में यह कहना ठीक रहेगा कि सूचना प्रौद्योगिकी का लाभ सामाजिक परिवर्तन को संभव व सहायक बनाने वाला होना चाहिए, न कि वर्तमान विषमताओं को और आगे बढाने वाला। इससे जीवन में आने वाले सांस्कृतिक व सामाजिक उद्वेलनों को भी चुनौती के रूप में स्वीकार करना होगा, तभी आज का विद्यार्थी सूचना प्रौद्योगिकी को समग्र रूप में ग्रहण कर सकेगा और सामाजिक आयाम प्राप्त कर सकेगा।

 

मानव संसाधन के मनोवैज्ञानिक आयाम

यद्यपि, चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक के बारे में यह कहा जा सकता है, कि दोनों का ही समान मौलिक उद्देश्य है, मानसिक अवसाद का निवारण, किंतु उनके प्रशिक्षण, दृष्टिकोण तथा प्रक्रिया-विज्ञान प्रायः भिन्न होते हैं। शायद सबसे महत्वपूर्ण भिन्नता यह है, कि मनोचिकित्सक अनुज्ञप्ति प्राप्त चिकित्सक होते हैं। इसी तरह मनोचिकित्सक प्रायः मानसिक समस्याओं के लिए चिकित्सीय मॉडल का प्रयोग करते हैं (अर्थात् जिनका वे उपचार करते हैं, उन्हें रोगग्रस्त मरीज माना जाता है) - यद्यपि बहुत से मनोचिकित्सक मानसिक उपचार विधि का भी सहारा लेते हैं।8, मनोचिकित्सक और औषधि मनोवैज्ञानिक (ये भी चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक होते हैं, किंतु इन्हें नुस्खा लिखने का अधिकार होता है) शारीरिक परीक्षण करने, प्रयोगशाला परीक्षणों एवं म्म्ळ करवाने की सलाह देने और व्याख्या करने तथा ब्ज् अथवा ब्।ज्, डत्प् और च्म्ज् स्कैनिंग करवाने की सलाह देने में सक्षम होते हैं।

 

चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक प्रायः दवा नहीं लिखते, यद्यपि मनोवैज्ञानिकों के लिए सीमित मात्रा में दवा लिखने के अधिकार के लिए आन्दोलन जोर पकड़ रहा है।9 इन औषधीय विशेषाधिकारों के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण और शिक्षा आवश्यक है। वर्तमान में औषधि मनोवैज्ञानिकों को गुआम, न्यू मैक्सिको और लुसियाना राज्यों में मनोअनुवर्ती औषधयन की सलाह देने का अधिकार रखते हैं, साथ ही कुछ सैन्य मनोवैज्ञानिकों को भी यह अधिकार है।10 सामाजिक कार्यकर्ता विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करते हैं जो प्रायः सामाजिक समस्याओं, उनके करणों और उनके समाधानों से संबंधित होते हैं। विशेष प्रशिक्षण प्राप्त कर चिकित्सीय सामाजिक कार्यकर्ता भी पारंपरिक समाज कार्य करने के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराने में सक्षम हो सकते है (जैसा अमेरिका और कनाडा में किया जा रहा है). अमेरिका में, समाज कार्य में स्नातकोत्तर कार्यक्रम दो वर्षीय तथा 60 क्रेडिट वाला होता है, जिसमें कम से कम एक वर्ष प्रायोगिक होता है (चिकित्साकर्मियों के लिए दो वर्ष)11

 

मानव संसाधन के आर्थिक आयाम

आपातकालीन प्रबंधकों को विविध क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जाता है जिससे उन्हें पूरे आपातकालीन जीवन-चक्र में सहायता मिलती है। पेशेवर आपातकालीन प्रबंधक सरकारी और सामुदायिक तैयारियों (अभियान की निरंतरता/ सरकारी योजना की निरंतरता), या निजी व्यापार तत्परता (व्यापार निरंतरता प्रबंधन योजना) पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। प्रशिक्षण स्थानीय, राज्य, संघीय और निजी संगठनों द्वारा प्रदान किया जाता है और इसमें सार्वजनिक सूचना और मीडिया संबंधों से लेकर उच्च स्तर की घटना होने पर आदेश देने और रणनीतिक कौशल जैसे - आतंकवाद बम विस्फोट स्थल का अध्ययन या एक आपात स्थिति के दृश्य को नियंत्रित करना, तक शामिल होता है।

 

अतीत में, आपातकालीन प्रबंधन के क्षेत्र में सेना या प्रथम रिस्पॉन्डर की पृष्ठभूमि वाले लोगों की भरमार रही है। वर्तमान में, इस क्षेत्र में अधिक विविध जनसंख्या है अनेक विशेषज्ञ सेना या प्रथम रिस्पॉन्डर इतिहास से इतर विभिन्न प्रकार की पृष्ठभूमि से हैं। आपातकालीन प्रबंधन या इससे संबंधित क्षेत्र में स्नातकपूर्व और स्नातक डिग्री प्राप्त करने वालों के लिए शिक्षा के अवसर बढ़ रहे हैं। अमेरिका के 180 से अधिक स्कूलों में आपात प्रबंधन से संबंधित कार्यक्रम हैं, लेकिन विशिष्ट रूप से आपात प्रबंधन में डॉक्टरेट का एक ही कार्यक्रम है।12 जैसे - जैसे आपात प्रबंधन समुदाय द्वारा विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका में, उच्च पेशेवर मानकों की आवश्यकता को मान्यता दी जाने लगी है, प्रमाणित आपात प्रबंधक (ब्म्ड) और प्रमाणित व्यापार निरंतरता प्रोफेशनल (ब्ठब्च्) जैसे व्यावसायिक प्रमाणपत्र आम बनते जा रहे हैं।

 

 

मानव संसाधन के आर्थिक आयाम

इंजीनियर और वैज्ञानिक पर्यावरणीय स्थितियों पर भौतिक, रासायनिक, जैविक, सांस्कृतिक और सामाजिक आर्थिक घटकों पर एक प्रस्तावित परियोजना, योजनाओं, कार्यक्रमों, नीतियों, या विधायी कार्यों के संभावित प्रभावों का आकलन करने के लिए एक प्रणालीगत पहचान और मूल्यांकन की प्रक्रिया का उपयोग करते हैं।वे यह मूल्यांकन करने के लिए वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग सिद्धांतों को लागू करते हैं, कि क्या जल की गुणवत्ता, वायु गुणवत्ता, वास गुणवत्ता, वनस्पति और प्राणीवर्ग, कृषि क्षमता, यातायात प्रभाव, सामाजिक प्रभाव, पारिस्थितिक प्रभाव, ध्वनी प्रभाव, दृश्य (परिदृश्य) प्रभाव आदि पर प्रतिकूल प्रभावों के पड़ने की संभावना है। अगर प्रभावों के पड़ने की संभावना है, तो वे ऐसे प्रभावों को सीमित या रोकने के लिए शमन उपायों को विकसित करते हैं। शमन उपाय का एक उदाहरण हो सकता है, पास के क्षेत्र में आर्द्र प्रदेश (वेटलैंड) का निर्माण करना, ताकि सड़क निर्माण के लिए आवश्यक वेटलैंड के भरने का शमन किया जा सके यदि सड़क की दिशा बदलना संभव ना हो। पर्यावरणीय मूल्यांकन के अभ्यास को 1 जनवरी 1970 को शुरू किया गया था, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रीय पर्यावरण नीति अधिनियम (छम्च्।) की प्रभावी तिथि है। उस समय से, 100 से अधिक विकासशील और विकसित देशों ने या तो विशिष्ट अनुरूप कानून की योजना बनाई या अन्यत्र इस्तेमाल किए जाने वाली प्रक्रिया को अपनाया। छम्च्। संयुक्त राज्य अमेरिका के सभी संघीय एजेंसियों पर लागू होता है।13 पर्यावरण सबकी धरोहर है, यदि सबका इस पर अधिकार है, तो प्रत्येक का इसके प्रति उत्तरदायित्व भी है, जिसे निभाने का सबसे लाभप्रद, तर्कसंगत और टिकाऊ रास्ता है उत्पादकता का कार्यकुशलता का तथा संसाधनों के संरक्षण का तथा इसमें सामान्यजन की भी अहम् भूमिका है और हम सब मिलकर ही पर्यावरण संरक्षण के कार्यों को अंजाम देकर देश के विकास एवं स्वयं के जीवनस्तर व गुणवत्ता दोनों में सुधार कर सकते हैं।

 

उपसंहार

 मानव संसाधन विकास के विभिन्न आयाम हैं।‘‘ जलवायु परिवर्तन ’’ एक विभाजित दुनिया में मानव एकता के लिए इस्तेमाल किये गये डेटा के अधिकांश 2005 या पहले से काफी हद तक प्राप्त कर रहे हैं, इस प्रकार 2005 के लिए एक भ्क्प् का संकेत था। सभी संयुक्त राष्ट्र के सदस्य राज्यों या आवश्यक आँकड़े प्रदान करने में सक्षम हैं। रिपोर्ट दुनिया एचडीआई में पिछले साल की रिपोर्ट के साथ तुलना में एक छोटी सी वृद्धि देखी गई। यह वृद्धि कम से कम विकसित देशों के समूह की विशेष रूप से विकासशील देशों में एक सामान्य, सुधार के द्वारा हो पाया था। सुधार उच्च आय वाले देशों के मानव विकास सूचकांक में कमीं के साथ ऑफसेट किया गया था। 0.5 नीचे एक मानव विकास सूचकांक ‘‘ कम विकास ’’ का प्रतिनिधित्व करने के लिए माना जाता है। उस श्रेणी में सभी 22 देशों अफ्रीका में स्थित हैं। उच्चतम स्कोरिंग उप - सहारा देशों, गैबॉन और दक्षिण अफ्रीका, क्रमशः 119 और 121 क्रमबद्ध हैं। इस श्रेणी में इस वर्ष से नौ देशों के दिवंगत और ‘‘ मध्यम विकास ’’ समूह में शामिल हो गए। 0.8 या अधिक की एक मानव विकास सूचकांक ‘‘उच्च विकास’’ का प्रतिनिधित्व करने के लिए माना जाता है। यह उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, ओशिनिया और पूर्वी एशिया में उन लोगों के रूप में सभी विकसित देशों, पूर्वी यूरोप, मध्य और दक्षिण अमेरिका, दक्षिण पूर्व एशिया, कैरिबियन और तेल समृद्ध अरब प्रायद्वीप में के रूप में के रूप में अच्छी तरह से कुछ विकासशील देशों में शामिल सात देशों के इस साल इस श्रेणी में पदोन्नत किया गया था, ‘‘ मध्यम विकास ’’ समूह छोड़ने: अल्बानिया, बेलारूस, ब्राजील, लीबिया, मैसेडोनिया, रूस और सऊदी अरब।

 

REFERENCE:

1.   Manav Sansadhan KO Vikshit karne me agrani, Vol. 6 (# 3) aug. 2004 & Vol. (8) (#3) 2006.

2.    एलवुड एफ होल्टों द्वितीय, जेम्स डब्ल्यू ट्रोट जूनियर, 1996, एक व्यावसायिक शिक्षा और मानव संसाधन विकास की और बढ़ता रुझान, व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा पत्रिका टवस 12, छव. 2ए च7

3.   वैश्विक वन क्षेत्र में निरंतर गिरावट जारी: एफ॰ए॰ओ॰, बिजनेस स्टैण्डर्ड

4.    वन स्थिति रिपोर्ट 2011, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार

5.   वानिकी में रोजगार के अवसर - इण्डिया वाटर पोर्टल

6.    Forests and the forestry sector&India FAO

7.    वन स्थिति रिपोर्ट 2011, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार

8.    ग्रेबर, एस एंड लिओनार्ड, एल (2005), अमेरिकन जर्नल के साइकोथेरपी, 59(1), 1-19

9.    क्लुज्मैन, लॉरेन्स. (2001). प्रेस्क्रैबिंग साइकोलॉजिस्ट्स एंड पेशंट्स मेडिकल नीड्सय लेसंस फ्रॉम क्लिनिकल साइकाइट्री. प्रोफेशनल साइकोलॉजीरू रिसर्च एंड प्रैक्टिस, 32(5), 496

10.  हैलोवे] जेनिफर. (2004). गेनिंग प्रेस्क्रिप्तिव नौलिज. मॉनिटर ऑन साइकोलॉजी, 35(6). पृष्ठ.22.

11.  http://www-cswe-org/NR/rdonlyres/111833A0-C4F5-475C-8FEB-EA740FF4D9F1/0/EPAS-pdf

12 .           Jaffin] Bob ΌSeptember 17] 2008½- "Emergency Management Training: How to Find the Right Program"- Emergency Management Magazine- vfHkxeu frfFk % 2008&11&15-

13   McGraw&Hill Encyclopedia of Environmental Science and Engineering Ό3rd Edition ed-½- McGraw&Hill] Inc- 1993-

 

 

Received on 11.12.2014       Modified on 20.12.2014

Accepted on 30.12.2014      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Ad. Social Sciences 2(4): Oct. - Dec., 2014; Page 213-216